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प्रकाशक
वर्जिन साहित्यपीठ

78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043

9868429241 / sonylalit@gmail.com




सर्वाधिकार सुरक्षित, प्रथम संस्करण - जून 2018
ISBN

कॉपीराइट © 2018
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अन्तर्द्वन्द्व

(काव्य संग्रह)









विजयतन्हा









विजयतन्हा

vijaytanhapwn2014@gmail.com

9450412708 / 9044520208

जन्म - 9-10-1966

पिता - स्व. श्री अवध विहारी लाल

माता - स्व. श्रीमती सावित्री देवी

शिक्षा - इण्टर मीडियट

काव्य लेखन शैली - ओज , हास्य-व्यंग्य , श्रंगार (गीत, गजल, कविता , मुक्तक, दोहा, छन्द , हाइकू)

काव्य सृजन - वर्ष 1984 से

मंचीय काव्यपाठ - ओज हास्य-व्यंग्य

रचना प्रकाशन - देश विदेश की पत्र पत्रिकाओं में

प्रकाशित कृति -शोषण के खिलाफकविता संग्रह थाईलैण्ड से

सम्पादन -प्रेरणापत्रिका (चतुर्मासिक 1999 से)

संस्थापक - "प्रेरणा परिवार" साहित्यिक संस्था (छः दशकीय साहित्यिक शून्यता मिटाने का सफल प्रयास)

सम्मान व पुरस्कार - समाज सेवा साहित्यिक सेवा में लगभग तीन दर्जन

सम्पर्क - "अवध भवन" पुवायाँ, शाहजहाँपुर (.प्र.) 242401





















मेरी दृष्टि में यहअन्तर्द्वन्द्व



साहित्य समाज को आईना दिखाता है और आईना कभी झूठ नहीं बोलता है।

समाज की संरचना हमने और आपने ही की है, आदरणीय विजय तन्हा जी की रचनाएं पढ़ी और विवश हो गया सोचने को।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य एवं विसंगतियों का मार्मिक शब्द चित्र है विजय तन्हा का काव्य संग्रह "अन्तर्द्वन्द्व" जिसमें "अहसास", "पेट की आग", "अपनापन", "एक सच" आदि रचनाओं में हृदय को स्पर्श कर झकझोर देने की क्षमता है।

"पैगाम" शीर्षक की रचना वास्तविकता में राजनीति पर एक करारा व्यंग्य है।

"श्रमिक" शीर्षक पर मालिकाना हक एक हकीकत है जो सामान्यता सोच से दूर की बात है।

श्री विजय तन्हा जी की लेखनी समाज में व्याप्त बिडम्बनाओं, कुरीतियों, रीतियों व नीतियों आदि पर निर्भय होकर साहित्य साधना पथ पर अग्रसर है।

वस्तुतः ऐसा साहित्य लेखन वर्तमान में सामाजिक असन्तुलन का बोध कराता है।

"आज के राम" माँ बाप के प्रति व्यवहार को पूर्णयता समर्पित रचना है, "हम सब इन्सान", "मदिरापान", "पेड़ की पीड़ा", "शब्द मंत्र", "शासनादेश", आदि अत्यन्त चिन्तनपरख हृदयस्पर्शी धरातलीय रचनाएं हैं "वो दीवार" और "मोहब्बत" में तन्हा जी की सोच का अभिनन्दन व वन्दन है दीवारों के कान होते हैं मुँह नहीं होता है सार्वभौमिक सोच को नमन।

तन्हा जी ने सामाजिक विसंगतियों पर लेखनी चलाकर जो काव्य सृजन किया और हम सब तक पहुँचाया निश्चित रूप से यह उनका सराहनीय एवं प्रशंसनीय कार्य है तन्हा जी की साहित्य साधना को शत शत नमन वन्दन।



संदीप गुप्ता (ग़ज़लकार)

7081262826











साहित्य साधना



हे शब्द साधक

ये साहित्य साधना

अधूरी है तब तक

जब तक तुम्हारी लेखनी से

निकलने वाला हर शब्द

किसी के ह्रदय को झकझोर कर

न रख दे |

या / न बन सके

भ्रष्टाचार के घनघोर तम में

नौजवाने के हाथो का दीपक |

या / कविता के शब्द

न कर सके चिनतन मनन को बाध्य |

हे शब्द साधक

कहीं तुम्हारी ये कविता

रह न जाये मात्र

हंसने हंसाने का साधन |

क्योंकि / हे साधक

तुम्हे ही कहते हैं समाज का दर्पण

ये तुम्हारी कविता के शब्द ही हैं

जो

हिमगिरि के ऊँचे शिखर पर खड़े

वतन के प्रहरी की रगों में

जब दौड़ते हैं

तब होते हैं सहायक

दुश्मन को ललकार के

कोसो दूर भगाने में |















अहसास



मैंने जब जब भी

लिखना चाहा

किसी पर करूण काव्य

वातानुकूलित कमरे में

मखमली गद्दे पर बैठकर |

तब तब याद आया है मुझे

प्रेयशी का आलिंगन

करूणा का भाव नहीं |

और फिर मैंने लिया

पेड़ की छाँव का सहारा

और चला गया

गरीब की झोपड़ियों में

जहाँ देखे भूख से रोते

और बिलखते बच्चे |

फिर देखा फुटपाथ पर

जीड़-झीड़ अबस्था में

मजदूरी करते गरीब को |

और यूँ ही

चिन्तन की दुनियाँ में

सैर करते करते

कचहरी, अस्पताल व कोतवाली

होकर लौटा ही था

कि निकल पड़ीं

मेरी कलम के गर्भ से

करूणा से ओत-प्रोत

अनेकानेक कविताएं |















असर



मैं भी लिखता हूँ

कविता |

तुम भी लिखते हो

कविता |

तमाम छोटे बड़े

रचनाकार लिखते हैं

कविता |

मगर सोचो

क्या ये कविता

कभी भर पाई

किसी का पेट |

या कोई बन पाया

कविता लिखकर सेठ |

हाँ ये बात अलग है

कविता लिख लिख

सीख ली हो चाटुकारिता

पा लिये हों कुछ

बड़े बड़े मंच |

मगर फिर भी ध्यान रहे

क्या कविता सुनकर

कुछ बदल पाया है

खुद को समाज |

क्या मंचो पर

गला फाड़कर चीख चीख

कविता सुनाने से

कुछ बदले हैं

पथ भ्रष्ट हो चुके नेतागण |

सच तो ये है

आजकी कविता

बनकर रह गयी है सिर्फ

मनोरंजन का साधन |





संस्कार



अच्छे संस्कारों से

निर्माण होता है

व्यक्तित्व का |

अच्छा व्यक्तितत्व ही

निर्माता है

स्वस्थ समाज का |

और

स्वस्थ समाज पर ही

निर्भर है

देश का भविष्य |

आओ !

हम सब मिलकर

देश के उज्ज्वल

भविष्य के लिये सुधारें

अपना आचरण

और

संस्कार दें

नई पीढी को |































यही है समाज



ये समाज है सिर्फ

बन्धन में जकड़े रखने के लिये

और / लोगों पर

तारे कसने के लिये ।

न जाने क्यों ये मुझे

अपनी गोदमें बिछाकर

थपकियाँ देकर

लोरियाँ सुनाकर

सपनो की दुनियाँ में

लिये जा रहा है ।

मगर मैं मौन

बस यही सोच रहा हूँ

अपने दिमाग को खरोच रहा हूँ

कि कल कहाँ था ये समाज ?

जब भूख से तड़प कर एक वृद्ध ने

तोड़ दिया था दम

और / उसका घर

एक महाजन कर रहा था नीलाम

हो रहे घर से बेघर

वे अनाथ बच्चे ।


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